देशराज्‍य

स्नो एवलांच, ग्लेशियर टूटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी के लिए फिलहाल कोई तंत्र नहीं

उच्च हिमालयी क्षेत्रों में स्नो एवलांच, ग्लेशियर टूटने और भारी-भरकम चट्टानों के दरकने से आने वाली भयावह प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी को लेकर सरकार, शासन के साथ ही तमाम वैज्ञानिक संस्थानों के पास कोई पुख्ता निगरानी तंत्र नहीं है। पहले चमोली में ही नीती घाटी और अब भारत-चीन सीमा पर सुमना-2 इलाके में हिमस्खलन की घटनाओं ने एक बार फिर  यह साबित कर दिया है।

रेन्डोल्फ़ ग्लेशियर इन्वेंटरी के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्र में कुल 1573 छोटे बड़े ग्लेशियर हैं। जो 2258 वर्ग किलोमीटर में फैले हुए हैं। लेकिन, इन 1573 ग्लेशियरों में से सिर्फ चुनिंदा 10 ग्लेशियरों की ही निगरानी वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिकों द्वारा जा रही है।

इनमें गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ स्थित चौराबाड़ी, जोशीमठ स्थित दूणागिरी, उत्तरकाशी स्थित ढोकरियानी समेत कुल 10 ग्लेशियरों की ही निगरानी को लेकर वाडिया इंस्टीट्यूट की ओर से ऑल वेदर मॉनिटरिंग स्टेशन लगाए गए। लेकिन, चमोली के नीती घाटी और भारत तिब्बत चीन सीमा पर सुमना इलाके में स्थित ग्लेशियरों और हिमस्खलनों की निगरानी के लिए कोई तंत्र वाडिया इंस्टीट्यूट के पास नहीं है। यही वजह है कि इन प्राकृतिक आपदाओं के आने की कोई सटीक जानकारी वैज्ञानिकों को नहीं मिल पा रही है।

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