देशराज्‍य

पंजाब रेजीमेंट के दो सैन्य जवान शहीद, 50-50 लाख मुआवजा और नौकरी का एलान

लद्दाख के सियाचिन के सब सेक्टर हनीफ में हिमस्खलन की चपेट में आकर पंजाब रेजीमेंट के दो जवान शहीद हो गए। इसमें कई जवान व पोर्टर फंस गए थे, जिन्हें बचा लिया गया है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने 21 पंजाब रेजीमेंट के शहीद सिपाही प्रभजीत सिंह और सिपाही अमरदीप सिंह के परिजनों को 50-50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता और परिवार के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का एलान किया है।

लद्दाख में सेना के सूत्रों ने बताया कि रविवार दोपहर एक बजे हिमस्खलन में कई जवान व पोर्टर फंस गए। सूचना पाकर सेना की रेस्क्यू टीम तत्काल मौके पर पहुंची। बचाव कार्य शुरू किया गया जिसमें कई दब गए। अन्य सभी जवानों व पोर्टर को सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन दो जवानों को तमाम प्रयासों के बाद भी शाम साढ़े सात बजे तक नहीं निकाला जा सका। गंभीर चोट के चलते उन्होंने दम तोड़ दिया। 

आज पार्थिव शरीर पहुंचेगा गांव
सिपाही प्रभजीत सिंह, मानसा जिले के गांव हाकमवाला के रहने वाले थे। उनके परिवार में उनके माता-पिता और एक बड़ा भाई है। इसी तरह सिपाही अमरदीप सिंह, बरनाला के गांव करमगढ़ के निवासी थे और उनके परिवार में उनके पिता और एक छोटी बहन है। शहीदों के शव लेह से उनके पैतृक गांवों में 27 अप्रैल को पहुंचेंगे। शहीदों के परिवारों के साथ हमदर्दी जताते हुए कैप्टन ने कहा कि अपनी जान जोखिम में डालकर देश की एकता और अखंडता की रक्षा के लिए उनकी समर्पित भावना अन्य सैनिकों को प्रेरित करती रहेगी।

पहले भी कई जवान हो चुके हैं शहीद
लद्दाख में बर्फीले तूफान व हिमस्खलन में फंसकर कई जवान शहीद हो चुके हैं। अक्तूबर 2020 में लेह-लद्दाख बॉर्डर पर पेट्रोलिंग पार्टी पर बर्फ का चट्टान गिर जाने से छह जवान शहीद हो गए थे। इसी साल मार्च में बीआरओ का एक कर्मचारी की भी हिमस्खलन में फंसने से मौत हो गई थी। नवंबर 2019 में चार जवान शहीद हो गए थे, जबकि दो नागरिकों की भी मौत हो गई थी। 

पाकिस्तान को हरा सियाचिन पर पाया नियंत्रण
सियाचिन ग्लेश्यिर समुद्र तल से 5400 मीटर की ऊंचाई पर है। भारत-पाकिस्तान से लगते एलओसी पर सियाचिन ग्लेशियर सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है ऑपरेशन मेघदूत में पाकिस्तान को पराजित करने के बाद भारत ने 13 अप्रैल 1984 से इसका नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया है। यहां भारतीय सेना की कई चौकियां 6400 मीटर की ऊंचाई पर भी है। ऊंचाई के चलते यहां ऑक्सीजन की कमी से सांस लेने में दिक्कत आती है। साथ ही तापमान भी जवानों के लिए चुनौतीपूर्ण साबित होता है। यह पूरा इलाका हिमस्खलन के खतरे वाला घोषित है।

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