वहीं, कोरोनाकाल में सैनिटाइजर का उपयोग भी बड़े पैमाने पर हुआ और संभव है कि इसमें पाए जाने वाले ट्राइक्लोसन के ज्यादा संपर्क में आने से बच्चों में समयपूर्व यौवन के मामले बढ़े हैं
पुणे में हुए शोध के मुताबिक, आठ से नौ साल के बच्चों में समयपूर्व यौवन (प्यूबर्टी) के मामलों में 3.6 फीसदी उछाल आया है, जिसका सबसे बड़ा कारण तनाव, नींद की कमी, मोबाइल फोन और सैनिटाइजर का इस्तेमाल माना गया है।
कोरोना महामारी में लॉकडाउन के दौरान भारतीय बच्चे पहले के मुकाबले जल्दी ‘बड़े’ हो गए और खासतौर पर लड़कियां तो इससे ज्यादा प्रभावित हुई हैं।
पुणे में हुए शोध के मुताबिक, आठ से नौ साल के बच्चों में समयपूर्व यौवन (प्यूबर्टी) के मामलों में 3.6 फीसदी उछाल आया है, जिसका सबसे बड़ा कारण तनाव, नींद की कमी, मोबाइल फोन और सैनिटाइजर का इस्तेमाल माना गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि कोरोना पाबंदियों के बीच अस्पताल आए 3,053 मरीजों में से 155 बच्चे (5.1 फीसदी) समयपूर्व यौवन को लेकर सलाह लेने आए जबकि महामारी से पहले इनकी संख्या 4,208 में से सिर्फ 59 (1.4 फीसदी) ही थी।
ट्राइक्लोसन से संपर्क बढ़ने का असर
वहीं, कोरोनाकाल में सैनिटाइजर का उपयोग भी बड़े पैमाने पर हुआ और संभव है कि इसमें पाए जाने वाले ट्राइक्लोसन के ज्यादा संपर्क में आने से बच्चों में समयपूर्व यौवन के मामले बढ़े हैं। हालांकि, इसके संबंध की पुष्टि के लिए और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। बता दे, ट्राइक्लोसन एक जीवाणुरोधी और एंटिफंगल एजेंट है जो टूथपेस्ट, साबुन, डिटर्जेंट, सैनिटाइजर, खिलौने जैसे उत्पादों में डाला जाता है।
- जहांगीर अस्पताल में हुआ अध्ययन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक एंडोक्रायनोलॉजी एंड मेटाबॉलिज्म में प्रकाशित हुआ है।
- अस्पताल में ग्रोथ एंड पीडियाट्रिक एंडोक्रायनोलॉजी विभाग में बाल रोग विशेषज्ञ अनुराधा खादिलकर का कहना है, वैसे तो बच्चों में प्यूबर्टी का सटीक कारण ज्ञात नहीं है। मोबाइल फोन के अधिक उपयोग, देर से नींद, तनाव, चिंता, अवसाद आदि को असामयिक यौवन का कारण माना जाता है और ये सभी कारक लॉकडाउन के दौरान प्रचलित रहे। लिहाजा, इन्हें आठ से नौ साल के बच्चों में प्यूबर्टी की वजह माना गया है।