(शंकर मुनि राय)
राजनांदगांव के अखबारी पृष्ठों पर प्रायः रोज ही अथवा नियमित छपने वाले डॉ. चंद्रकुमार जैन विगत एक साल से कहीं नहीं दिख रहे हैं. यह एक बड़ी खबर है, किन्तु अखबारी दुनिया में इसे खबर नहीं माना जा रहा है. जिन अख़बारों के पृष्ठ डॉ. जैन के आलेखों के बिना अधूरे लगते थे, वे भी नहीं बता रहे कि ऐसा क्यों हो रहा है. मेरा मानना है कि इस नगर की पत्रकारीय दुनिया में उनकी अलग पहचान है. घटनाएं समसामयिक हों या स्थायी साहित्यिक, डॉ. जैन की टिप्पणी अख़बारों द्वारा मांगी ही जाती थीं. कई बार तो मैंने यह बताते हुए भी सुना है कि इसे कैसे छापना है. मतलब यह नहीं कि वे पत्रकारिता गुरु है, बल्कि यह कि उनका परामर्श महत्वपूर्ण जरूर माना जाता रहा है.
आज डॉ. जैन का ६३वां जनम दिन है. और किसी को भी यह जान-सुन कर अचरज हो सकता है कि जैन साहब लगातार २८ वर्षों तक प्राध्यापकीय कार्य करते हुए अपनी शासकीय सेवा से इस माह स्वेच्छा से सेवानिवृत्त हो रहे हैं. स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की कई तरह की मजबूरियां होती हैं. लेकिन उनमे से एक मज़बूरी स्वास्थ्यगत हो तो, उसे अच्छा नहीं कहा जा सकता. किसी भी सक्रीय सेवक का इस तरह अचानक सेवानिवृत्त होना सुखद अहसास नहीं दिला सकता है.
जैन साहब के साथ विगत १४ वर्षों से प्राध्यापकीय कार्य कर रहा हूँ. इसलिए यह विलगाव अब मुझे विछोह-सा लग रहा है. कई बार और कई तरह से उन्हें याद करना स्वाभाविक है. उनका विनोदी और आत्म सम्मानी स्वाभाव हो या उनके शब्दों की जादूगरी, कभी भुलाई नहीं जा सकती. अंग्रेजी शब्दों को हिंदी अथवा छत्तीसगढ़ी संस्कार देकर अर्थान्तरित करने की रोचक कला है उनके पास. प्रसंग चाहे सामान्य बातचीत का हो या गंभीर चिंतन का भाषा के साथ लापरवाही कभी नहीं सुनी गई उनसे.
डॉ. जैन के बारे में लिखते हुए मुझे कहना है कि मेरा मानना है कि किसी की अनावश्यक प्रशंसा नहीं करनी चाहिए. साथ ही यह भी कि जो प्रशंसनीय है उसकी उपेक्षा भी नहीं की जानी चाहिए. इस अर्थ में मेरा मानना है कि जैन साहब जैसा वक्ता होना दुर्लभ है. ऐसी प्रतिभा गिने-चुने लोगों को मिलती है. किसी भी प्रकार की प्रतिभा यदि अलौकिक देन है तो प्राप्तकर्त्ता की जिम्मेदारी है कि वह उसका सम्मान करे. यह योग्यता जैन साहब में मुझे भरपूर देखने को मिलती है. अपनी आवाज को शब्दों की ध्वनि और प्रकृति के अनुसार सम्प्रेषित करने की अद्भुत कला है आपमें !
‘माई का लाल’ एक मुहावरा है, जिसका सामान्य अर्थ है बहादुर या साहसी. इसकी चुटीली व्याख्या करते हुए जैन साहब अपने को ‘माइक लाल’ मानते है. किसी के हाथ में माइक देखकर वे बेचैन हो जाते हैं. वे नहीं चाहते कि उनके सामने कोई और माइक पर बोले. बहुधा लोग उनकी इस आदत को उनकी कमजोरी मानते हैं, पर मुझे लगता है कि इस कमजोरी में उनका भाषा-सम्मान शामिल है. माइक पर कोई कुछ भी बोल जाए और वहीँ बैठा एक दक्ष वक्ता उसे चुपचाप सुन ले, यह चंद्रकुमार जैसे कुशल वक्ता के लिए असहनीय है. और मौका मिलते ही वे यह भी जता देते है कि माइक पर कैसे बोला जाता है. माइक पकड़ने से लेकर उसकी मौखिक दूरी का पैमाना तय करना और फिर एक-एक शब्द का प्रासंगिक उच्चारण करना उनसे ही सीखा जा सकता है.
बोलना भी एक कला है, इसका एहसास डॉ. जैन को माइक पर सुनने पर अपने आप हो जाता है. लगातार किसी भी प्रसंग पर रोचक तरीके से ऐसे बोलना कि वक्ता को पता ही नहीं चले कि कब एक घंटा बीत गया, यह आसान कला नहीं है, पर डॉ. जैन के लिए यह आसान से भी आसान है. यही कारण है कि नगर सहित आसपास के किसी भी प्रकार के मंचीय कार्यक्रम में उनकी अनुपस्थिति खल जाती है. जिले में निर्वाचन आयोग का चुनाव प्रशिक्षण हो, पुलिस विभाग का वार्षिक प्रशिक्षण समारोह, नगर या आसपास कहीं भी मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का आगमन, कार्यक्रम संचालन के लिए इन्हीं का नाम सबकी जुबान पर आता है.
डॉ. जैन तेज रफ़्तार के पाठक और लेखक दोनों हैं. कम समय में बहुत सारे कार्य करने की ललक है उनमे. जो कुछ भी अच्छी लगे वह अपने कब्जे में हो और जल्दी भी, यह उनकी आदत में शामिल है. यह बात मैं उनकी पढ़ाकू प्रवृत्ति के लिए कह रहा हूँ. शुरू से विज्ञान का विद्यार्थी रहते हुए हिंदी में एम् ए पीएचडी करने से भी मन नहीं भरा तो और नौ विषयों में एम् ए. कर लिए. आचार्य विद्यासागर महाराज की ‘मूकमाटी’ पर पीएचडी करने वाले जैन साहब शुरू में न्यायिक क्षेत्र में जाना चाहते थे, इसलिए एलएलबी किये. राष्ट्रपति पदक सहित सामाजिक, शैक्षणिक एवं साहित्यिक गतिविधियों में रचनात्मक योगदान के लिए अनेक प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित हो चुके जैन साहब का आभ्यान्तरिक गुण मुझे दार्शनिक ही लगता है. उनकी यह विशेषता उनकी काव्यकला में देखने को मिलती है.
कविता के बारे में मेरा विचार यही है कि यदि उसमे कवि का निजी दर्शन न हो तो कविता अधूरी लगती है. कविता की इस विशेषता को जानने के लिए कवि की रचना के साथ-साथ उसके व्यक्तिगत जीवन को जानना भी जरुरी है. विगत १४ वर्षों में मैंने उनकी दोनों प्रकृति को देखा और समझा है. डॉ. जैन के लिए स्वाभिमान की रक्षा करना बहुत जरुरी है, इसके लिए वे किसी से भी समझौता करने वाले नहीं हैं, चाहे उनकी सरकारी नौकरी ही क्यों न हो! इसीलिए वे अपनी एक कविता में लिखते हैं-
“रहो जमीं पे मगर आसमां का ख्वाब रखो
तुम अपनी सोच को हर वक्त लाजवाब रखो
खड़े न हो सको इतना न सर झुकाओ कभी
तुम अपने हाथ में किरदार की किताब रखो l “
विभागाध्यक्ष-हिंदी
शासकीय दिग्विजय महाविद्यालय, राजनाँदगाँव
संपर्क :९८९३८६३५४८