संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत पर्याप्त नहीं है आधार
नई दिल्ली, । सुप्रीम कोर्ट ने धर्मांतरण पर जैन समुदाय के दो वर्गों के बीच विवाद से संबंधित याचिका पर विचार करने से इन्कार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट शरद जावेरी और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। श्वेतांबर मूर्तिपूजक जैन धर्म के तपगछ संप्रदाय के मोहिजीत समुदाय के सदस्यों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 1991 के अधिनियम को लागू करने और धर्मांतरण को रोकने की मांग कर रहे थे। जिस पर विचार करने से सुप्रीम कोर्ट ने इन्कार कर दिया।
एक ही संप्रदाय के दो समूहों के बीच है विवाद- सुप्रीम कोर्ट
दरअसल, याचिका में यह भी सुनिश्चित करने की मांग की गई थी कि पूजा स्थल जहां तपगछ के अनुयायी धार्मिक अधिकारों का प्रयोग करने के हकदार हैं, भिक्षुओं सहित संप्रदाय के सभी सदस्यों के लिए खुले हैं। उसका उल्लेख करते हुए पूजा स्थलों पर डिस्प्ले बोर्ड लगाए जाएं। इस पर न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने कहा कि वर्तमान मामले में विवाद एक ही संप्रदाय के दो खंडों के बीच है, इसलिए एक ही धर्म के दो संप्रदायों के विवाद में पूजा स्थल अधिनियम 1991 लागू नहीं किया जा सकता है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत पर्याप्त नहीं है आधार
जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दावा किए गए अधिकारों को साबित करने के लिए सबूत पेश किए जाने चाहिए और उक्त विवाद को केवल भारत के संविधान, 1950 के अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका में दायर किए गए कथनों और हलफनामों पर भरोसा करके हल नहीं किया जा सकता है। केवल तथ्य यह है कि याचिकाकर्ता पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 का आह्वान करते हैं। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक याचिका पर विचार करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है।