आतंकवाद के दौर में कश्मीरी पंडितों का घाटी से विस्थापन तो हुआ लेकिन सलाम की परंपरा अब भी कायम है। इसे आतंकवाद का ग्रहण नहीं लगा है। अब भी महा शिवरात्रि पर मुस्लिम परिवारों की ओर से घाटी में 157 स्थानों तथा माइग्रेंट कॉलोनी में रहने वाले अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडितों को सलाम की परंपरा के तहत मुबारकबाद देते हैं। खुलकर मिलते जुलते हैं। पंडित भी उनकी खुले दिल से आवभगत करते हैं। सलाम की परंपरा शिवरात्रि के अगले दिन यानी बुधवार को होगी।
कश्मीरी पंडितों का कहना है कि जब आतंकवाद नहीं था और घाटी में सब लोग मिल जुलकर भाईचारे के साथ रहते थे। महाशिवरात्रि का जश्न कई दिनों तक चलता था। मुस्लिम भाई भी इसमें सहयोग करते थे और सलाम की परंपरा तो कुछ अपनी तरह की होती थी। कहीं किसी से कोई भेदभाव नहीं रहता। हालांकि, विस्थापन के बाद इसके जोश में कमी आई है, लेकिन अब भी यह परंपरा कायम है। मुस्लिम परिवार तथा यार-दोस्त पहुंचकर मुबारकबाद देते हैं और कश्मीरी पंडितों के घर में खाना खाते हैं। यह परंपरा गांव के साथ ही शहरों में भी निभाई जाती है। मुस्लिमों के साथ ही कश्मीरी पंडित समुदाय को भी इस दिन का इंतजार रहता है।
कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के संजय टिक्कू अलगाववादियों के गढ़ रहे श्रीनगर के डाउनटाउन में रहते हैं। उन्होंने आतंकवाद के दौर में भी विस्थापन नहीं किया। उनका कहना है कि सलाम की परंपरा को आतंकवाद का ग्रहण नहीं लगा है। मुस्लिम परिवार अब भी पूरे उत्साह के साथ कश्मीरी पंडितों के घरों पर आकर उनसे शिवरात्रि पूजा के विषय में पूछताछ करते हैं। मुबारकबाद देते हैं और प्रसाद भी ग्रहण करते हैं। उनका कहना है कि कश्मीरी पंडितों को पड़ोसी मुस्लिमों के आने का इंतजार रहता है। इससे भाईचारा और मजबूत होता है।
कश्मीरी पंडितों को इस दिन का रहता है इंतजार
कश्मीरी पंडित सतीश महालदार का कहना है कि आतंकवाद से पहले कश्मीरी पंडितों की कई परंपराएं वक्त के साथ बदली हैं। परंपराओं के निवर्हन में उत्साह में भी कमी आई है, लेकिन परंपराएं खत्म नहीं हुई हैं। ऐसे में महाशिवरात्रि पर होने वाली सलाम की परंपरा अब भी जीवित है। कश्मीरी पंडितों को इस दिन का इंतजार रहता है। पड़ोसी मुस्लिम मुबारकबाद के साथ ही उपहार भी देते हैं। कहा कि इस परंपरा से भाईचारे को बढ़ावा मिलता है। आपस के विश्वास को बल मिलता है।
जम्मू आकर भी बधाई देते हैं मुस्लिम
पनुन कश्मीर के प्रवक्ता एमके धर का कहना है कि तीन दशक पहले कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हुआ। ज्यादातर परिवार जम्मू आ गए। कई परिवार देश के अन्य हिस्सों में भी जाकर बस गए। लेकिन सलाम की परंपरा का निर्वहन करने के लिए अब भी कश्मीर से कुछ मुस्लिम परिवार जम्मू आकर पंडित परिवारों को मुबारकबाद देते हैं। हालांकि, ज्यादातर लोग फोन पर ही बधाई देते हैं और महाशिवरात्रि के पूजन के विषय में जानकारी लेते हैं।