राजनादगांव I शासकीय दिग्विजय स्वाशासी महाविद्यालय राजनादगांव के प्राचार्य डॉ अंजना ठाकुर के कुशल
मार्गदर्शन में तथा विभागाध्यक्ष डॉ. किरण लता दामले के नेतृत्व में विश्व सरीसृप जागरूकता
दिवस का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. माजिद अली ने किया। कार्यक्रम की
अध्यक्षता करते हुए डॉ. किरण लता दामले ने सर्वप्रथम मुख्य अतिथि का पुष्पगुच्छ देकर
सम्मान करते हुए , मुख्य अतिथि का परिचय दिया तथा पर्यावरण एवं इकोसिस्टम के लिए
उनके योगदान को इंगित किया। मुख्य अतिथि प्रसिद्ध सरीसृप वैज्ञानिक डॉ एच.के.एस. गजेंद्र
थे, वे डीएस शासकीय महाविद्यालय कसडोल से प्राचार्य पद से सेवा निवृत्ति हुए हैं । वह विगत
30 वर्षों से सर्पमित्र नामक एक एनजीओ संचालित कर रहे हैं । जिसके द्वारा उन्होंने
झारखंड, उडीसा, मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ ,महाराष्ट्र , तेलंगाना तथा आंध्र प्रदेश के गांव तथा
शहरों में छोटे-छोटे समूह बनाकर उन्हें सर्प पकड़ने तथा उनकी सुरक्षा और रेस्क्यू का प्रशिक्षण
दिया। देश भर में 500 से अधिक ऐसे सर्प मित्र समूह न केवल सापों तथा अन्य बेजुबान
जानवरों जो सड़कों पर घायल हो जाते हैं, बीमार हो जाते हैं, की सुरक्षा तथा देखभाल करते हैं।
डॉ. गजेंद्र ने अपने विस्तृत व्याख्यान में दिग्विजय महाविद्यालय के विद्यार्थियों को बताया कि
सांपों का उत्पत्ति पहली बार लगभग 128 मिलियन वर्ष पहले दक्षिणी गोलार्ध के गर्म, वनीय
पारिस्थितिकी तंत्र में भूमि पर हुआ था। वे संभवतः प्राचीन महाद्वीप लॉरेशिया से आये थे। ये
अपनी जीभ से तथा अपने मुँह की छत में स्थित जैकबसन ऑर्गन से गंध सूंघते हैं। वे अपने
आस-पास के अन्य जानवरों की गर्मी का पता लगा सकते हैं। साँप अपने निचले जबड़े से
ज़मीन पर होने वाले कंपन को महसूस करके सुनते हैं। सांपों की पलकें नहीं होतीं, बल्कि उनके
पास एक पारदर्शी परत होती है जो उनकी आंखों की रक्षा करती है और उन्हें खुली आंखें रखकर
सोने में मदद करती है। उनके निचले जबड़े लचीले होते हैं, जिससे वे अपनी खोपड़ी से 75%
से 100% बड़े आकार के जीवों को भी निगल सकते हैं। दुनिया भर में साँपों की 3,700 से
अधिक प्रजातियाँ हैं।अस्तित्व में मौजूद कुछ सबसे विषैले साँप समुद्र में रहते हैं। साँप का जहर
शिकार को स्थिर कर देता है और मांस को तोड़कर पाचन में सहायता करता है। सरीसृप
इकोसिस्टम के खाद्य जाल में एक महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं यदि सरीसृप ना हो तो पूरा एक
सिस्टम ध्वस्त हो जाएगा तथा मनुष्य का पृथ्वी पर जीवित रहना कठिन हो जाएगा। अनजाने
में हम सांपों को मार देते हैं जबकि 97% सांप ऐसे होते हैं जिनके काटने से मनुष्य की मृत्यु
नहीं हो सकती, केवल तीन प्रतिशत सिर्फ ऐसे हैं जिनके काटने से मनुष्य की मृत्यु होती है
किंतु सांप मनुष्य पर तभी हमला करता है जब उसे अपनी जान का खतरा होता है । अनजाने
में हम सभी सांपों को खतरनाक समझकर मार देते हैं जो सीधे अपने पर्यावरण को हम
नुकसान पहुंचाते हैं डॉ. गजेंद्र ने सांप काटने पर सर्वप्रथम क्या प्राथमिक उपचार करना चाहिए
तथा उसे कैसे बचाव करना चाहिए, चलचित्रों के माध्यम से छात्रों को समझाया। कार्यक्रम के
अंत में डॉक्टर संजय ठिसके ने धन्यवाद ज्ञापित किया। इस कार्यक्रम में प्रो. गुरप्रीत सिंह
भाटिया, प्रो. चिरंजीव पाण्डेय, प्रो. करुणा रावटे एस.एल. देवांगन राहुल देवांगन,
रितेश भान्डेकर, सुमन रामटेके, प्रिया जायसवाल, मीनाक्षी देवांगन तथा एम्.एस.सी. पूर्व –
अंतिम के समस्त विद्यार्थी एवं स्नातक स्तर के 500 से अधिक छात्र-छात्राएं उपस्थित थे।