पांच वर्ष पहले गुजरात में जाति और कंधों पर बैठकर नेता बने हार्दिक पटेल की असली परीक्षा गुजरात विधानसभा चुनावों में होगी। इस चुनाव में उनका राजनीतिक भविष्य तय हो जाएगा। भाजपा में भले ही हार्दिक की एंट्री हो गई हो, लेकिन आज भी पाटीदार समाज समेत भाजपा का एक गुट उनके आने से नाखुश है…
गुजरात के चर्चित पाटीदार नेता हार्दिक पटेल गुरुवार को आखिरकार भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा में शामिल होने से पहले हार्दिक ने भाजपा कार्यालय ‘कमलम’ तक का एक रोड शो निकाला। इसके बाद दोपहर 12.39 बजे के विजय मुहूर्त में उन्होंने प्रदेश अध्यक्ष सीआर पाटिल की मौजूदगी में भाजपा की सदस्यता भी ग्रहण की। इस मौके पर उन्होंने कहा कि ‘आज मैं भाजपा में शामिल नहीं हुआ हूं, बल्कि ये मेरी घर वापसी हुई है।’ साल के अंत में होने वाले गुजरात चुनाव को देखते हुए भाजपा में हार्दिक की एंट्री बेहद अहम मानी जा रही है। हार्दिक पाटीदार समाज में एक जाना पहचाना चेहरा है। जिसके सहारे भाजपा इस वोट बैंक में पकड़ मजबूत कर सकेगी। भाजपा में हार्दिक का असल संघर्ष पहले दिन से शुरू होगा, क्योंकि उन्हें उस कांग्रेस को भी जवाब देने हैं जहां वह तीन साल रहे हैं, और उन भाजपा नेताओं का सामना भी करना है जिन्हें वह अब तक खरी-खोटी सुनाते आए थे।
भाजपा के एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि पांच वर्ष पहले गुजरात में जाति और कंधों पर बैठकर नेता बने हार्दिक पटेल की असली परीक्षा गुजरात विधानसभा चुनावों में होगी। इस चुनाव में उनका राजनीतिक भविष्य तय हो जाएगा। भाजपा में भले ही हार्दिक की एंट्री हो गई हो, लेकिन आज भी पाटीदार समाज समेत भाजपा का एक गुट उनके आने से नाखुश है। पार्टी उन्हें विधायक का टिकट देगी या नहीं यह तो समय बताएगा। लेकिन यह बात सही है कि भाजपा उन्हें चुनौती मिलने वाली जगह से ही उम्मीदवार बनाएगी। पाटीदार समाज का एक खेमा हार्दिक से नाराज चल रहा है। संभावना है कि चुनाव के वक्त वे सामने आकर विरोध करने लगे, तो हार्दिक के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। अगर हार्दिक पटेल भी अल्पेश ठाकोर की तरह चुनाव हार जाते हैं तो उनके राजनीतिक करियर का अंत होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।
भाजपा ने साधे एक तीर से दो निशाने
इधर, गुजरात भाजपा के वरिष्ठ नेता ने अमर उजाला से कहा कि हार्दिक को भाजपा में शामिल कर पार्टी ने एक तीर से दो शिकार किए हैं। पहला यह कि भाजपा पाटीदार के उन नेताओं को संदेश देना चाहती है, जो सालों से अपनी सीट पर जमकर बैठे हैं। दूसरा यह कि पार्टी हार्दिक पटेल को कभी इतना बड़ा नहीं होने देगी कि वे भाजपा के लिए पाटीदार वोट बैंक को लेकर मजबूरी बन जाएं। अगर नरेश पटेल कांग्रेस की तरफ झुकते हैं, तो उसी कांग्रेस को जवाब देने के लिए हार्दिक का भरपूर इस्तेमाल किया जाएगा। भाजपा हार्दिक से प्रचार भी करवाएगी और उन्हें वो रुतबा भी देगी। ताकि लोगों को लगे कि भाजपा पार्टी पाटीदारों के साथ है। यह बात जरूर सच है कि अब जब हार्दिक पटेल भाजपा के सदस्य बन ही गए हैं, तो उन पर दर्ज केस भी वापस होंगे। हालांकि फिलहाल इसमें इतनी जल्दबाजी नहीं दिखाई जाएगी। नहीं तो विपक्ष फिर भाजपा पर सवाल खड़ा करेगा। ऐसे में हो सकता है पहले छोटे-मोटे केस खत्म किए जाएं। हालांकि इसके लिए भी हार्दिक को पार्टी के प्रति निष्ठा साबित करनी होगी।
चुनाव के बाद साइड लाइन होंगे हार्दिक!
प्रदेश के राजनीतिक जानकारों का कहना है कि हार्दिक के भाजपा में शामिल होने से गुजरात भाजपा को इसका फायदा मिलेगा। प्रदेश का पाटीदार समुदाय लंबे समय से भाजपा के साथ है। 80-85 फीसदी पाटीदार-पटेल के वोट भाजपा को मिलते रहे हैं। 2017 के चुनाव में अमानत आंदोलन और पाटीदारों पर लाठीचार्ज से नाराजगी के बाद भी पाटीदार वोटर पूरी तरह से भाजपा से अलग नहीं हुआ था। हालांकि, कुछ हिस्सों में उसकी नाराजगी का भाजपा को नुकसान जरूर हुआ। हार्दिक के आने से भाजपा को पटेल-पाटीदार समाज से पुराना जनाधार वापस लौटने की उम्मीद है।
जानकार कहते है कि हार्दिक की राजनीति सालों से भाजपा के सामने हैं। यह भी हो सकता है कि हार्दिक के सहारे भाजपा अपने हित साध ले फिर, उन्हें साइड लाइन कर दे। क्योंकि ऐसे कई नेता है जो पहले कांग्रेस में थे और अब भाजपा में हैं। आज भाजपा में उन्हें कोई पूछता ही नहीं हैं। दूसरा पहलू यह भी है कि विधानसभा चुनावों में पार्टी हार्दिक को विधायक का टिकट दे। एक गुट हार्दिक को चुनाव लड़ाएगा जबकि दूसरा गुट उन्हें हराने का काम करेगा।
गुजरात की राजनीति में कितना अहम है पाटीदार वोटर?
गुजरात में करीब 12 फीसदी पाटीदार वोटर हैं। पाटीदार-पटेल दो वर्गों में बंटा हुआ है। कड़वा पटेल और लेउवा पटेल। हार्दिक पटेल कड़वा पटेल हैं। पाटीदार वोटरों में कड़वा पटेल 60 फीसदी और लेउवा पटेल 40 फीसदी हैं। लेउवा पटेलों की ज्यादातर आबादी सौराष्ट्र-कच्छ इलाके के राजकोट, जामनगर, भावनगर, अमरेली, जूनागढ़, पोरबंदर, सुरेंद्रनगर, कच्छ जिलों में रहती है। वहीं, कड़वा पटेल समुदाय के लोग उत्तर गुजरात के मेहसाणा, अहमदाबाद, कड़ी-कलोल, विसनगर इलाके में बहुलता से हैं।
गुजरात की कुल 182 विधानसभा सीटों में से लगभग 70 सीटों पर पटेल वोटर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पाटीदार आंदोलन की वजह से सीटों का नुकसान हुआ था। पार्टी 100 सीटों का आंकड़ा भी नहीं पार कर पाई थी। उसे सिर्फ 99 और कांग्रेस को 82 सीटें मिली थीं। सबसे ज्यादा नुकसान सौराष्ट्र क्षेत्र में हुआ था। जहां की 56 सीटों में से 32 पर कांग्रेस को जीत मिली थी। वहीं, भाजपा को महज 22 सीटों से संतोष करना पड़ा था। जबकि 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के 36 विधायक पाटीदार समाज से थे वहीं, 2017 के इनकी संख्या घटकर 28 हो गई थी। जबकि कांग्रेस के 20 पाटीदार विधायक जीते थे। गुजरात में फिलहाल भाजपा के 44 विधायक, छह सांसद और राज्यसभा में तीन सांसद पाटीदार समुदाय से हैं।