सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने ईडब्लूएस आरक्षण को वैध ठहराया था। उस फैसले के बाद ये आशंका उठी थी कि 50 प्रतिशत अधिकतम आरक्षण का बैरियर टूटने के बाद राज्यों में कोटा बढ़ाने की होड़ मच सकती है। अब वैसा ही होता दिख रहा है। ताजा मामला छत्तीसगढ़ का है जहां शिक्षा और नौकरी में 76 प्रतिशत आरक्षण की तैयारी है।
रायपुर: छत्तीसगढ़ में आरक्षण को लेकर सियासत गरम है। इस बीच आरक्षण संशोधन विधेयकके प्रस्ताव को भूपेश कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। अब इसे सरकार एक दिसंबर को होने वाली विधानसभा के विशेष सत्र में पेश करेगी। सरकार इसे पूरे डाटा के साथ विधानसभा के विशेष सत्र में रखेगी हालांकि बीजेपी लगातार आदिवासी आरक्षण में कुछ विशेष मांगों को लेकर सरकार को घेरने का काम कर रही थी। ऐसे में विधानसभा का विशेष सत्र भी हंगामेदार रहने के आसार हैं। वहीं, सरकार के फैसले पर विशेषज्ञों के मन में कई सवाल भी हैं।
दरअसल, गुरुवार को मुख्यमंत्री निवास में सीएम भूपेश बघेल कैबिनेट की बैठक हुई थी। इसमें आरक्षण संशोधन विधेयक को मंजूरी दी गई है। बैठक के बाद सरकार के प्रवक्ता कृषि मंत्री रविंद्र चौबे ने जानकारी दी। हालांकि किस वर्ग को आरक्षण में कितना फायदा मिलेगा उसकी स्थिति अब तक स्पष्ट नहीं हुई है। साथ ही बताया कि आने वाले एक और दो दिसंबर को विधानसभा के विशेष सत्र में पेश होने वाले आरक्षण विधेयक के विषय में विस्तार से चर्चा की गई है।
इसमें अनुसूचित जनजाति के अलावा अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और ईडब्ल्यूएस के आरक्षण पर भी बात हुई है। उन्होंने बताया कि इससे पहले उच्च न्यायालय ने जिला कैडर का आरक्षण खारिज कर दिया था। इसलिए जिला कैडर के आरक्षण को भी एक्ट में लाया जाएगा।आरक्षण की चर्चा के विषय पर समझने का प्रयास करें तो यह विधेयक आबादी के आधार पर बनाया गया है।
आदिवासियों के लिए 32% आरक्षण का प्रावधान है और सभी वर्गों में कुल 76 पर्सेंट का आरक्षण मिल सकता है। वहीं, आरक्षण संशोधन विधेयक कैबिनेट में मंजूरी के साथ ही यह माना जा रहा है। सभी वर्गों को मिलाकर प्रदेश में अब आरक्षण का कुल प्रतिशत 76 हो जाएगा। इसमें आदिवासियों को 32 परसेंट आरक्षण, इसी तरह अनुसूचित जाति के लिए 13 परसेंट, ओबीसी आरक्षण को बढ़ाकर 27% प्रस्तावित, सामान्य वर्ग के गरीब ईडब्ल्यूएस को 4% आरक्षण। इसी तरह विधानसभा में पेश किए जाने वाले संशोधन विधेयक में कुल आरक्षण का जो प्रतिशत होगा वह 76% होने की बात कही जा रही है।
आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर संशय
हालांकि आरक्षण संशोधन विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है। अभी इसे विधानसभा में पेश करना बाकी है। इतना ही नहीं जानकारों की मानें तो संशोधन विधेयक को विधानसभा में पारित करवाने में कोई परेशानी नहीं होगी। वहीं, राज्यपाल जब तक मंजूरी नहीं दे देती, तब तक इसे कानून का स्वरूप नहीं दिया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की तरफ नजर डालें तो राज्यपाल इस विधेयक को पुनर्विचार के लिए सरकार के माध्यम से विधानसभा को वापस लौटा सकती हैं। यह भी हो सकता है कि आगे राष्ट्रपति के पास अनुमोदन के लिए भेज भी सकती है।
ऐसे में अभी इसे पास करवाने में बहुत सारी अड़चनें हैं। इनके दूर हो जाने के बाद ही 76 फीसदी तक प्रदेश में कोटा हो सकता है। वरिष्ठ पत्रकार बाबूलाल शर्मा ने नवभारत टाइम्स.कॉम से बातचीत में बताया कि आरक्षण संशोधन विधेयक को लेकर सत्ताधारी कांग्रेस और विपक्षी दल दोनों ही आवाज उठा रहे थे। हालांकि कांग्रेस की सरकार ने अपना वादा पूरा करते हुए कैबिनेट में इसे मंजूरी दे दी है।
उन्होंने कहा कि अभी इसे विधानसभा सत्र में रखा जाएगा। हालांकि बीजेपी इस विधेयक का विरोध करती भी है, तब भी यह विधेयक पूर्ण रूप से विधानसभा में पारित हो जाएगा। हालांकि जब तक विधेयक को कानून का दर्जा नहीं मिल जाता, तब तक आरक्षण नहीं माना जाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि राज्यपाल की तरफ से इस विधेयक को मंजूरी भी दे दी जाएगी। इसे नवमी अनुसूची के माध्यम से बनाया जाएगा।
बाबूलाल शर्मा ने बताया कि नवमी अनुसूची को समझने का प्रयास करें तो इसमें यह प्रावधान है कि इस माध्यम से किए गए निर्णय की सुनवाई किसी कोर्ट में नहीं होगी। इसलिए आरक्षण संशोधन विधेयक को अगर कानून का दर्जा मिलता है तो उसे नवमी अनुसूची के दायरे में रखकर निर्णय लेना पड़ेगा। अगर राज्यपाल ने इसे राष्ट्रपति को अनुमोदित कर दिया तो तब इसमें काफी वक्त लग सकता है।
छत्तीसगढ़ में हो जाएगा 76 प्रतिशत आरक्षण
छत्तीसगढ़ की बात करते हैं। 1 दिसंबर से राज्य विधानसभा का सत्र शुरू होने जा रहा है। इस दौरान कुल आरक्षण को 76 प्रतिशत तक बढ़ाने से जुड़ा विधेयक किया जाएगा। राज्य कैबिनेट ने गुरुवार को इससे जुड़े दो विधेयकों के मसौदे को मंजूर दे दी। सीएम भूपेश बघेल की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट मीटिंग में छत्तीसगढ़ लोक सेवा एससी/एसटी/ओबीसी (संशोधन) विधेयक 2022 और छत्तीसगढ़ एजुकेशनल इंस्टिट्यूशंस एडमिशन बिल- 2022 को मंजूरी दी गई। हाल ही में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 2012 के राज्य सरकार के उस ऑर्डर को असंवैधानिक ठहराया था जिसमें ओवरऑल कोटा को बढ़ाकर 58 प्रतिशत किया था। कोर्ट ने एसटी कोटा को 32 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत कर दिया था। उसके बाद से ही राज्य में आदिवासी समुदाय के बीच जबरदस्त असंतोष था जिसे दूर करने के लिए भूपेश बघेल सरकार दो नए बिल लाने जा रही है। ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि राज्य की कांग्रेस सरकार एसटी कोटा को 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशथ, एससी कोटा को 12 से बढ़ाकर 13 प्रतिशथ और ओबीसी कोटा को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत और ईडब्लूएस आरक्षण को 4 प्रतिशत पर सीमित करने की तैयारी कर रही है।
झारखंड सरकार ने कुल आरक्षण 77 प्रतिशत किया
इसी महीने झारखंड विधानसभा ने कुल आरक्षण को 60 प्रतिशत से बढ़ाते हुए 77 प्रतिशत करने से जुड़े विधेयक को सर्वसम्मति से मंजूरी दी। उसके मुताबिक, अब अनुसूचित जनजाति को 28 प्रतिशत आरक्षण मिलेगा जो पहले 26 प्रतिशत था। इसी तरह ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत और अनुसूचित जाति का आरक्षण 10 से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने का प्रावधान है। इस तरह सूबे में अब कुल आरक्षण 77 प्रतिशत पहुंच जाएगा। अभी यह लागू नहीं हुआ है लेकिन माना जा रहा है हेमंत सोरेन सरकार इसके लिए नौवीं अनुसूची वाला रास्ता अपनाएगी।
कर्नाटक ने भी पिछले महीने बढ़ाया आरक्षण
पिछले महीने कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने भी शिक्षा और नौकरी में एससी/एसटी आरक्षण को बढ़ाने का फैसला किया। इससे जुड़े अध्यादेश को राज्यपाल की मंजूरी के बाद 1 नवंबर को राज्य के स्थापना दिवस पर लागू भी कर दिया गया है। कर्नाटक में पहले ओबीसी के लिए 32 प्रतिशत, एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था थी। अब एससी आरक्षण को 2 प्रतिशत बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी कोटा को 4 प्रतिशत बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। आरक्षण कानून की न्यायिक समीक्षा न हो सके, इसके लिए राज्य सरकार संविधान की नौवीं अनुसूची का सहारा लेगी।
हरियाणा में प्राइवेट सेक्टर जॉब में लोकल के लिए 75 प्रतिशत आरक्षण
इसी साल मार्च में हरियाणा विधानसभा ने प्राइवेट सेक्टर की नौकरियों में स्थानीय युवाओं के लिए 75 प्रतिशत आरक्षण से जुड़ा कानून हरियाणा स्टेट इम्प्लॉयमेंट ऑफ लोकल कैंडिडेट्स ऐक्ट 2020 पास किया। कानून के मुताबिक, राज्य में 30 हजार रुपये महीने तक वाली प्राइवेट नौकरियों में स्थानीय उम्मीदवारों को 75 प्रतिशत रोजगार दिया जाएगा। यह 10 से ज्यादा कर्मचारी वालीं सभी कंपनियों, सोसाइटी, ट्रस्ट वगैरह पर लागू होगा। इस कानून को 10 साल के लिए लागू किया जाना है।
ईडब्लूएस आरक्षण के बाद टूट गया आरक्षण का 50 प्रतिशत वाला बैरियर
इनके अलावा अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग जातियां आरक्षण को लेकर उग्र आंदोलन करती रही हैं। मसलन हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन, गुजरात का पाटीदार आरक्षण आंदोलन, राजस्थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण आंदोलन। राज्य सरकारों ने कई बार आरक्षण के लिए कानून भी बनाया लेकिन वे अदालत में टिक नहीं सके। सुप्रीम कोर्ट ने इसी महीने ईडब्लूएस आरक्षण को वैध ठहराया। सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक है क्योंकि इसने इंदिरा साहनी केस में तय की गई आरक्षण की अधिकतम 50 प्रतिशत सीमा का बैरियर भी तोड़ दिया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने 3-2 के बहुमत से दिए अपने फैसले में आरक्षण पर एक नई लकीर खींच दी है। एक तो ये कि 50 प्रतिशत आरक्षण की अधिकतम सीमा ऐसी नहीं है जिसका उल्लंघन न हो सके। दूसरा ये कि पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के लिए सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ेपन से इतर आर्थिक पिछड़ेपन के रूप में किसी अन्य पैमाने को मान्यता दी। इस फैसले के बाद से ही आशंका जताई जा रही थी कि अब चूंकि 50 प्रतिशत आरक्षण का बैरियर टूट गया है, इसलिए राज्यों में अपने-अपने यहां आरक्षण बढ़ाने की होड़ सी मच जाएगी। अब वह आशंका सच होती दिख रही है। आरजेडी, एसपी समेत कई क्षेत्रीय दल लंबे समय से जातिगत जनगणना की मांग करते आए हैं ताकि आबादी के अनुपात में आरक्षण को फिर से तय किया जा सके।
क्या है संविधान की 9वीं अनुसूची?
आखिर संविधान की नौवीं अनुसूची है क्या जिसका सहारा छत्तीसगढ़ से लेकर झारखंड और कर्नाटक सरकार लेना चाहती हैं? नौवीं अनुसूची को संविधान में 1951 के पहले संशोधन के जरिए जोड़ा गया था। संविधान के अनुच्छेद 31 ए और 31बी के तहत इसमें शामिल कानूनों को न्यायिक समीक्षा से संरक्षण हासिल है। आसान भाषा में कहें तो संविधान की नौंवी सूची में शामिल कानून न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर होते हैं यानी सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट उसकी समीक्षा नहीं कर सकते। इसीलिए अक्सर आरक्षण से जुड़े कानूनों को नौवीं अनुसूची में डालने की मांग होती रहती है। 1951 में नौवीं अनुसूची बनने पर भूमि सुधार और जमींदारी उन्मूलन समेत कुल 13 कानूनों को जोड़ा गया था। दरअसल, आजादी के बाद जब भारत में भूमि सुधार को शुरू किया गया तो उसे यूपी, एमपी और बिहार की अदालतों में चुनौती दी गई थी। पटना हाई कोर्ट ने 12 मार्च 1951 को बिहार भूमि सुधार कानून को अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक करार दे दिया। इसी के बाद केंद्र की तत्कालीन पंडित जवाहर लाल नेहरू सरकार ने संविधान में नौवीं अनुसूची को जोड़ा और इसे न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर कर दिया। फिलहाल नौवीं अनुसूची में 283 कानून हैं जिन्हें समय-समय पर संविधान संशोधनों के जरिए इसमें शामिल किया गया। खास बात ये है कि किसी कानून को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद अगर संविधान संशोधन के जरिए उसे नौवीं अनुसूची में डाल दिया जाता है तो वह कानून लागू हो जाता है।
नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों की भी समीक्षा कर सकता है सुप्रीम कोर्ट
ऐसा नहीं है कि नौवीं अनुसूची में किसी कानून को शामिल कर लिया जाए तो उसकी न्यायिक समीक्षा ही नहीं हो सकती। अगर कानून मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है या संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है तो सुप्रीम कोर्ट उसकी समीक्षा कर सकता है। जनवरी 2007 में तत्कालीन सीजेआई वाईके सबरवाल की अगुआई वाली 9 जजों की संविधान पीठ ने नौवीं अनुसूची को लेकर ऐतिहासिक फैसला दिया। कोर्ट ने साफ किया कि किसी कानून को नौवीं अनुसूची में डालने का मतलब ये नहीं है कि उसकी न्यायिक समीक्षा या संवैधानिक वैधता की जांच नहीं की जा सकती। अगर संबंधित कानून मूल अधिकार के खिलाफ है तो ऊपरी अदालतें उसे रद्द कर सकती हैं।
आरक्षण मूल अधिकार नहीं : सुप्रीम कोर्ट
संविधान में आरक्षण का प्रावधान सीमित समय के लिए किया गया था। लेकिन हर 10 साल पर आरक्षण को अगले 10 साल तक के लिए और बढ़ाने का रिवाज चलता आ रहा है। क्या आरक्षण मूल अधिकार है? नहीं। 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण को लेकर बहुत अहम टिप्पणी की थी। कोर्ट ने कहा कि आरक्षण मूल अधिकार नहीं है। दरअसल, तमिलनाडु के तमाम राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट से राज्य में मेडकल और डेंटल कोर्स के ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए केंद्र को निर्देश देने की मांग की थी। उसी पर सुनवाई करते वक्त जस्टिस एल. नागेश्वर राव की अगुआई वाली बेंच ने कहा कि आरक्षण का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है। उसके बाद राजनीतिक दलों ने अपनी याचिका वापस ले ली थी। इससे पहले उसी साल फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं हो सकता।
इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने तय की थी आरक्षण की 50% की सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने ‘इंदिरा साहनी और अन्य बनाम भारत सरकार, 1992’ केस में ऐतिहासिक फैसला दिया था। 9 जजों की संविधान पीठ ने 6-3 के बहुमत से जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 प्रतिशत तय की। दरअसल, साल 1991 में केंद्र की तत्कालीन पीवी नरसिम्हा राव सरकार ने आर्थिक आधार पर सामान्य श्रेणी के लिए 10 फीसदी आरक्षण देने का आदेश जारी किया था, जिसे इंदिरा साहनी ने कोर्ट में चुनौती दी थी। इसी फैसले की काट के लिए 1993 में तमिलनाडु सरकार ने नौवीं अनुसूची का सहारा लेकर नौकरी और शैक्षिक संस्थानों में दाखिले में अधिकतम आरक्षण को 69 प्रतिशत कर दिया। इसमें 18 प्रतिशत एससी, 1 प्रतिशत एसटी, 20 प्रतिशत ‘मोस्ट बैकवर्ड कास्ट्स’ (MBC) और अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) के लिए 30 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। सूबे में ओबीसी कोटे के अंदर ही अल्पसंख्यक समुदाय के लिए आरक्षण की व्यवस्था है। इसमें मुस्लिमों के लिए 3.5 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल है। मई 2021 में भी मराठा आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी फैसले को दोहराया था। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार के मराठा आरक्षण के फैसले को इंदिरा साहनी जजमेंट के खिलाफ बताते हुए असंवैधानिक करार दिया था।