
शादी 2013 में हुई थी, लेकिन दिसंबर 2014 sa अलग रहने लगे। 2015 में पति ने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग करते हुए पारिवारिक अदालत का दरवाजा खटखटाया और तलाक की मंजूरी मिल गई। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि शादी के बाद शारीरिक संबंध स्थापित नहीं करना तलाक का आधार बन सकता है। साथ ही यह पति के साथ क्रूरता है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने पारिवारिक अदालत का फैसला सही ठहराते हुए पत्नी की याचिका खारिज कर दी।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक महिला की तलाक के खिलाफ याचिका खारिज कर दी है। यह मामला एक दंपति से जुड़ा है, जिनकी शादी वर्ष 2013 में हुई थी लेकिन वे केवल एक साल के भीतर दिसंबर 2014 से अलग रहने लगे थे। जिसके बाद 2015 में पति ने पुणे की पारिवारिक अदालत में तलाक की अर्जी दाखिल की थी, जिसमें पत्नी द्वारा की गई क्रूरता को आधार बनाया गया था।
पारिवारिक अदालत ने पति की याचिका को स्वीकार कर तलाक मंजूर कर लिया था, लेकिन पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। साथ ही, उसने यह भी अपील की थी कि पति को उसे एक लाख रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया जाए।
याचिकाकर्ता महिला ने दावा किया कि उसके ससुराल वालों ने उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, लेकिन वह अब भी अपने पति से प्यार करती है और वैवाहिक संबंध खत्म नहीं करना चाहती। दूसरी ओर, पति ने अदालत में आरोप लगाया कि पत्नी ने शारीरिक संबंध बनाने से इनकार किया, उस पर अवैध संबंधों का झूठा शक किया और दोस्तों, रिश्तेदारों और कर्मचारियों के सामने उसे अपमानित कर मानसिक पीड़ा पहुंचाई।
2013 में हुई थी शादी, 2014 से दोनों अलग रह रहे थे
बता दें कि महिला का विवाह 2013 में हुआ था, लेकिन दिसंबर 2014 में वे अलग रहने लगे। पुरुष ने 2015 में क्रूरता के आधार पर तलाक के लिए पुणे की पारिवारिक अदालत का दरवाजा खटखटाया, जिसे मंजूर कर लिया गया। उधर, दूसरी तरफ महिला ने अपनी याचिका में कहा कि उसके ससुराल वालों ने उसे परेशान किया था। वह अब भी अपने पति से प्यार करती है और इसलिए वह शादी खत्म नहीं करना चाहती।






