कांकेर जिला (उत्तर बस्तर)प्रदेश

कोण्डागांव : साग-सब्जी के बीज उत्पादन से ‘चैनू राम‘ बना लखपति : आधुनिक कृषि पद्धति को अपनाकर बीज उत्पादन से हो रही शानदार आमदनी

विरले ही ऐसे कृषक होते है जो बदलते वक्त को पहचान कर कृषि की नई परिपाटी को अपनाते हुए स्वयं को एक सफल कृषक के दर्ज में रखते है। विकासखण्ड कोण्डागांव से 15 कि.मी. दूर उमरगांव के गायता पारा में रहने वाले चैनू राम मण्डावी भी ऐसे ही कृषक है जिन्होंने कृषि क्षेत्र में एक शानदार मुकाम बना लिया है। अगर उनकी कृषि उपलब्धि की चर्चा की जाये तो अपनी 4 एकड़ की भूमि में सिर्फ लौकी, कुम्हड़ा, टिंडा, दोड़का जैसे साग-सब्जियों के बीजो का उत्पादन करके इस वर्ष लगभग 25 लाख से अधिक आय अर्जित कर ली है। एम.ए तक षिक्षित चैनूराम बताते है कि घर में बड़े होने के नाते उन पर कृषि कार्य करने का दबाव था पिता और चाचा सामान्य कृषक थे जबकि माँ घर-गृहस्थी संभालती थी। वर्ष 1989-90 में उनके पिता और चाचा धान जैसे परम्परागत फसलो का उत्पादन करके मात्र 5 हजार सालाना कमा पाते थे, परन्तु चैनू राम ने स्नात्कोत्तर की डिग्री होने के पश्चात् कृषि क्षेत्र में कुछ नए करने की चाह के चलते अपना रुख साग-सब्जी के बीज उत्पादन की ओर कर दिया। हालाकि शुरुवाती दौर में उन्होंने साग-सब्जी उगाने का प्रयास किया। परन्तु शीघ्र ही उन्हें सब्जियों का उत्पादन करना लाभप्रद नहीं लगा बजाय बीज उत्पादन के। क्योंकि सब्जियों के बाजार मूल्य में घट-बढ़ होते रहती थीे जिससे सब्जी विक्रय के दौरान उसका मूल्य लागत निकालना मुष्किल हो जाता था। इसे देखते हुए उन्होंने बस्तर क्षेत्र के उन्नतषील कृषको से संपर्क किया और उनसे बीज उत्पादन के वैज्ञानिक एवं तकनीकी पहलुओं को सीखकर सब्जियों के बीज उत्पादन करने का विचार किया।
इस प्रकार वर्ष 2014 में सर्वप्रथम उन्होंने कुम्हड़ा फसल की खेती की और इससे उन्हें 39 हजार रुपये का लाभ हुआ। इससे प्रोत्साहित होकर उन्होंने बी.एन कंपनी नामक बीज उत्पादक संस्था से संपर्क भी किया और अपने 4 एकड़ की भूमि में ड्रिप, स्पिं्रकलर, बैड सैपट और मल्चिंग कराकर एक हाईटेक कृषि प्रक्षेत्र का रुप दिया। फलस्वरुप आज वो अपने गांव के प्रथम साग-बीज उत्पादक किसान के रुप में चर्चित हो चुके है। इसे देखते हुए उनके आस-पास के कृषको ने भी प्रेरणा लेकर बीज उत्पादन प्रारंभ कर दिया है औश्र हजारों रुपये की आय अर्जित कर रहे है। श्री मण्डावी ने यह भी बताया कि उन्होंने दूसरे गांव के अन्य बीज उत्पादक कृषको का वाट्सअप ग्रुप भी बना लिया है जिसमें वे बीज की गुणवत्ता को बढ़ाने अन्य फसलीय बीमारी के समाधान के बारे में आवष्यक सलाह मष्वरा भी करते है। उनका यह भी मानना है कि अगर स्थानीय कृषक समुदाय का वास्तविक विकास होना है तो हमें जल, जंगल, जमीन की अवधारणा को समझना होगा। जल अर्थात पानी का सही उपयोग, जंगल अर्थात वन संरक्षण एवं जमीन मतलब भूमि की उर्वरता एवं गुणवत्ता को बनाये रखना है। अपने शुरुवात दौर के संघर्ष को याद करते हुए उन्होंने यह भी बताया कि प्रारंभ से ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था, कि ‘मन की सुनो और उसे पूरा करने के लिए जी-जान से पूरा जूट जाओ‘ और शायद इसी ईच्छा शक्ति के बदौलत चैनू राम मण्डावी ने अपने आप को एक सफल कृषक के रुप में स्थापित कर लिया है।
यहां यह भी बताना उचित होगा कि कलेक्टर नीलकंठ टीकाम द्वारा अपने समस्त ग्रामीण क्षेत्र के प्रवास एवं दौरो के दौरान ग्रामीणों को जल, जंगल, जमीन के महत्व और उसमें आधुनिक कृषि के समायोजन को समझाने का विषेष प्रयास किया जाता है वे मानते है कि स्थानीय वनवासी समुदाय के आर्थिक, सामाजिक विकास में जल, जंगल, जमीन की विषेष भूमिका रहेगी और इसी का परिणाम है कि चैनू राम मण्डावी जैसे कृषको ने इसके महत्व को समझ कर कृषि क्षेत्र में उपलब्धि हासिल किया है।

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