बॉलीवुड

अभिनय के साथ ही इन अभिनेत्रियों ने संभाली थी निर्देशन की कमान

50 और 60 के दशक में राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार की त्रिमूर्ति ऐसी थी कि लाखों लोग इनकी एक्टिंग के दीवाने थे। लेकिन, राज कपूर अपनी फिल्में निर्देशित भी किया करते थे। गुरु दत्त, देव आनंद और किशोर कुमार भी अभिनेता होने के साथ-साथ निर्देशक भी थे। तो क्या ऐसी अभिनेत्रियां भी रही हैं जिन्होंने अभिनय के साथ-साथ निर्देशन में भी उतना ही नाम कमाया हो और खुद को निर्देशित किया हो जैसा राज कपूर, किशोर कुमार, गुरु दत्त या देव आनंद करते थे।फ्लैशबैक में जाएं तो जहन में आती हैं फातिमा बेगम जिन्हें हिंदी सिनेमा की पहली महिला फिल्म निर्देशक भी कहा जाता है। 1926 में उन्होंने फिल्म ‘बुलबुल ए परिस्तान’ का निर्देशन किया था। वो साइलेंट फिल्मों का दौर था और अकसर मर्द ही हीरोइन का रोल भी कर लिया करते थे, लेकिन 1922 में फातिमा ने ‘वीर अभिमन्यू’ नाम की फिल्म में बतौर हीरोइन काम किया। चंद साल के अंदर-अंदर वो फिल्म लिखने, निर्देशित करने लगीं और अपना बैनर भी बनाया। उस जमाने के हिसाब से वो बड़ी बात थी। वो अकसर फैंटसी फिल्में बनातीं और फोटोग्राफी का ऐसा इस्तेमाल करती कि वो स्पेशल इफेक्ट की तरह लगता। फातिमा बेगम कोहिनूर और इंपीरियल स्टूडियो की बड़ी फिल्मों में बतौर हीरोइन काम करती रहीं और साथ ही अपने बैनर तले हीर रांझा, शकुंतला जैसी फिल्में निर्देशित करती रहीं। उनकी बेटी जुबैदा 1931 में पहली टॉकी फिल्म ‘आलम आरा’ की हीरोइन बनीं।इसी तरह शोभना समर्थ 40 के दशक की बड़ी स्टार थीं- नूतन और तनुजा की मां और काजोल की नानी। भरत मिलाप, राम राज्य जैसी फिल्मों में सीता के रोल में वो इतनी मशहूर थीं कि कैलेंडर पर उनकी फोटो बतौर सीता छपती थी, फिल्म में जब वो आतीं तो लोग श्रद्धा में फूल बरसाने लगते। जब बेटियों नूतन और तनुजा को लॉन्च करने की बारी आई तो शोभना ने खुद निर्देशन और निर्माण की कमान संभाली।अकसर बड़े अभिनेता अपने बेटों को लॉन्च करते हैं लेकिन यहां शोभना समर्थ ने खुद फिल्म बनाकर दोनों बेटियों का करियर शुरू किया। हमारी बेटी (1950) में नूतन और तनुजा को लॉन्च किया। छबीली (1960) की निर्देशक भी वही थीं। 30 और 40 के दशक में अशोक कुमार के साथ कंगन, बंधन और झूला जैसी फिल्में करने वालीं और लक्स साबुन के लिए पहली भारतीय महिला मॉडल बनने वाली लीला चिटनिस ने भी 1955 में ‘आज की बात’ का निर्देशन किया। 40 के दशक में फिल्मों में बतौर हीरोइन काम करने वाली प्रोतिमा दासगुप्ता ने कुछ फिल्में निर्देशित कीं। लेकिन, कहते हैं कि 1948 में उनकी बनाई फिल्म ‘झरना’ देखने के बाद तब बॉम्बे प्रेसिडेंसी के मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई ने इस पर बैन लगा दिया था क्योंकि उनके हिसाब से ये फिल्म बहुत ही उत्तेजक थी। आने वाले सालों में साईं परांजपई, कल्पना लाजमी जैसी महिला निर्देशक थीं लेकिन किसी बड़ी अभिनेत्री का अभिनय करते हुए निर्देशन भी करने का ट्रेंड अब भी धीमा ही था।

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