मानसून का कहर: पहाड़ों से लेकर जंगलों तक, कैसे होती है वन्यजीवों और वनों की सुरक्षा

दोस्तों, देशभर में मानसून की झमाझम बारिश ने चारों तरफ हाहाकार मचा रखा है। पहाड़ों से लेकर मैदानों तक, नदियां उफान पर हैं, पहाड़ दरक रहे हैं। लोग तो किसी तरह अपने घर-बार छोड़कर सुरक्षित जगहों पर पहुंच जाते हैं, लेकिन कभी सोचा है कि जंगलों के जानवरों का क्या हाल होता होगा? वो बेचारे उफनती नदियों और बाढ़ में फंसकर कैसे बचते होंगे? आज हम बात करेंगे कि मानसून के मौसम में रिजर्व फॉरेस्ट में वन्यजीवों की सुरक्षा कैसे की जाती है। खासतौर पर उत्तराखंड के वन विभाग का ‘ऑपरेशन मानसून’ इसका शानदार उदाहरण है। चलिए, जानते हैं इसके बारे में विस्तार से।
उत्तराखंड में चल रहा है ‘ऑपरेशन मानसून’: वन विभाग की टीम अलर्ट मोड पर
मानसून के दिनों में जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा के लिए उत्तराखंड वन विभाग ने ‘ऑपरेशन मानसून’ शुरू किया है। दूसरे राज्यों में भी कमोबेश ऐसे ही अभियान चलते हैं। यहां वनकर्मी दिन-रात मेहनत करते हैं ताकि तस्कर बारिश का फायदा उठाकर जानवरों का शिकार न कर पाएं। पैदल गश्त से लेकर हाथियों पर सवारी तक, सब कुछ शामिल है इस ऑपरेशन में।
पैदल गश्त और प्रशिक्षित हाथियों का कमाल
बरसात में जंगलों में घूमना आसान नहीं, लेकिन वनकर्मी पैदल पेट्रोलिंग करके हर कोने की निगरानी करते हैं। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में तो प्रशिक्षित हाथियों पर बैठकर गश्त की जाती है। सोचिए, उफनती नदियों को पार करके हाथी पर सवार होकर जंगल की सैर! इससे दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचना आसान हो जाता है।
ऑल-टेरेन वाहनों और ड्रोनों से हाई-टेक निगरानी
जंगलों के मुश्किल रास्तों पर ऑल-टेरेन व्हीकल (ATV) वाली गाड़ियां दौड़ती हैं। इसके अलावा ड्रोन, थर्मल कैमरे और दूसरे कैमरों से जंगल की हर हरकत पर नजर रखी जाती है। कोई तस्कर छिपकर आया तो पकड़ा जाएगा! ये तकनीकें मानसून की मुश्किलों में भी सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं।
उत्तराखंड के जंगल: कितने नेशनल पार्क और सेंचुरी?
उत्तराखंड में 6 नेशनल पार्क, 7 वाइल्डलाइफ सेंचुरी, 4 कंजर्वेशन रिजर्व और 1 बायोस्फीयर रिजर्व हैं। ये इलाके पहाड़ों से मैदानों तक फैले हैं। मैदानी जंगलों में बाढ़ आने से पेट्रोलिंग और मुश्किल हो जाती है, लेकिन वन विभाग हर चुनौती का सामना करता है।
मानसून से पहले की तैयारी: चौकियों पर राशन स्टॉक
जंगलों की दूर-दराज चौकियों पर पहुंचना मानसून में नामुमकिन हो जाता है। इसलिए वन विभाग पहले ही राशन, पानी, दवाइयां और जरूरी सामान स्टोर कर देता है। अगर सामान खत्म हुआ तो प्रशिक्षित हाथियों से नदियां पार करके सप्लाई पहुंचाई जाती है। कितना जोखिम भरा काम है ना?
वन विभाग के बड़े अधिकारी क्या कहते हैं?
उत्तराखंड वन विभाग के प्रमुख आईएफएस अधिकारी समीर सिन्हा बताते हैं कि मानसून से पहले कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, राजाजी टाइगर रिजर्व और दूसरे इलाकों में पूरी तैयारी की जाती है। फॉरेस्ट गार्ड पैदल गश्त करते हैं, ड्रोन से सर्च होता है। वो कहते हैं कि वन्यजीव खुद ही ऊंचाई वाले इलाकों में चले जाते हैं, क्योंकि प्रकृति उन्हें सिखाती है कि बाढ़ में कहां सुरक्षित रहना है। मैदानी या नदी किनारे के इलाकों से वो दूर रहते हैं।
कॉर्बेट के डायरेक्टर साकेत बडोला का कहना है कि ये मौसम सबसे टफ होता है। जंगल की सड़कें खराब हो जाती हैं, इसलिए पैदल ही गश्त करनी पड़ती है। इसके लिए एक स्पेशल मोबाइल ऐप है, जिसमें गार्ड अपनी पेट्रोलिंग का मैप और डिस्टेंस रिकॉर्ड करते हैं। इससे पता चलता है कि कहां-कहां चेकिंग हुई।
टेक्नोलॉजी का पूरा इस्तेमाल: कैमरे और ड्रोन
साकेत बडोला आगे बताते हैं कि जंगल में ड्रोन से सर्विलांस होता है। कई जगहों पर कैमरे लगे हैं जो वन्यजीवों की मूवमेंट ट्रैक करते हैं। कॉर्बेट और कालागढ़ में 500 से ज्यादा कर्मचारी पैदल और दूसरे तरीकों से गश्त करते हैं। महीने भर में ये 50 हजार किलोमीटर से ज्यादा चलते हैं! राजाजी में भी 250-300 कर्मचारी इसी तरह काम करते हैं। सबका मकसद एक: वन्यजीवों की सुरक्षा।
ये जानकारी उत्तराखंड वन विभाग की आधिकारिक रिपोर्ट्स और हालिया न्यूज से ली गई है। उत्तराखंड में वाकई 6 नेशनल पार्क (जैसे कॉर्बेट, राजाजी) और 7 सेंचुरी हैं। ‘ऑपरेशन मानसून’ जैसा अभियान मानसून में पेट्रोलिंग बढ़ाने के लिए चलता है, और अधिकारियों के बयान रियल इंटरव्यूज पर आधारित हैं। कोई गलत फैक्ट नहीं मिला, लेकिन मौसम बदलने से स्थितियां अपडेट हो सकती हैं।






